नवाक्षर, नवोत्पल साहित्यिक मंच की पहली पत्रिका थी। यह एक दीवार-पत्रिका थी। इसका विधिवत उदघाटन हिन्दी साहित्य के चर्चित आलोचक श्री परमानंद श्रीवास्तव जी एवं दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्व विद्यालय के तत्कालीन कुलपति श्री अरुण कुमार ने किया था। लघु स्तर पर यह एक चर्चित पत्रिका रही। इसके उठाए मुद्दों पर अध्यापक कक्षाओं मे भी चर्चा करते थे । इस वाल-मैगजीन को कुछ नियत जगहों पर ही चिपकाया जाता था ताकि यह पाठकों के लगातार पहुँच में रहे। इस पत्रिका मे महज तीन पृष्ठ होते थे। प्रथम पृष्ठ मे संपादकीय होती थी, जिसे मै स्वयं लिखता था। इसका विषय नवोत्पल के गुरुवारीय विमर्श मे सामूहिक चर्चा द्वारा तय किया जाता था। यह गुरुवारीय विमर्श दरअसल एक बहुत ही आकर्षक बैठक हुआ करती थी। इसमें बड़ी संख्या मे छात्र-छात्राएं एवं अध्यापक गण परिभाग करते थे। इस साप्ताहिक विमर्श मे विमर्श के अलावा एक कवि-सम्मेलन अवश्य ही होता था, जिसकी रपट अगले दिन विभिन्न समाचार-पत्रों मे भी देखी जा सकती थी। पत्रिका का दूसरा पृष्ठ कुछ जरूरी सूचनाओं एवं संवादों के लिए आरक्षित था। तीसरे पेज मे हम एक नवोदित कवि की रचना छपते थे जो संपादकीय एवं एक विशेषज्ञ टिप्पणी से सुशोभित रहती थी।
श्रीश पाठक 'प्रखर'
अजीब सी उधेड़बुन मची रहती है ज़ेहन में. लगता है जैसे कितना कुछ करना हो और कितना कम हो पा रहा हो. सीखता तो रोज ही कुछ न कुछ हूँ ....न ...न ...ये ज़िंदग...
Shreesh तो जो तटस्थ रहेंगे , समय लिखेगा उनका भी इतिहास....तो शामिल सरे होंगे इतिहास में, पर हाँ हम शायद अपनी-अपनी भूमिका के लिए जी रहे हैं, या लड़ रहे हैं...!
तो इस कविता ने भी कुछ प्रश्न किये हैं. कविताओं के माध्यम से आपने इतने प्रश्न किये हैं, ये दुनिया, समाज कभी इसे उत्तर दे पाएंगे..?
Apr 28 '11
Shreesh और बिना इसकी परवाह किये आप बस लिखे जाते हैं......प्रेरणा....?
May 2 '11
Shyam Juneja २८ अप्रैल के बाद २ मई और आज १ दिसंबर... ओ श्याम तू अपने न्वोत्पल को इस कदर कैसे भूल गया था !